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नेमीचन्द्र पाटनी आगरा
जन्म तिथि एवं स्थान जन्म १९६९ वि.स. आषाण सुदी १४, ११ जुलाई १९१२ – अवसान – २० जन २००३ आगरा माता-पिता का नाम श्रीमान मगन लाल पाटनी -चाचा का नाम हीरालाल जी पाटनी शिक्षा ७ वी पास पत्नी का नाम कंचन बेन सन्तान का नाम सुरेन्द्र ५१ वर्ष की उम्र में निधन २- नगेन्द्र - (संदीप तथा अनंत पाटनी (अमेरिका)३- श्रीमती इंद्रा बज कोटा ४- चाँद रानी जयपुर भाई सोभाग्यमलजी बोम्बे के लडके - १- गजेन्द्र को तत्व रूचि है | २- अशोक पाटनी ३- नरेंद्र पाटनीस्व.सुरेन्द्र पाटनी आयु ५१ २- नागेन्द्र (सन्तान संदीप एवं अनंत पाटनी अमेरिका) श्रीमती इंद्रा बज कोटा एवं श्रीमती चाँद रानी जयपुर भाई बहिन के नाम सोभाग्यमल पाटनी – सन्तान गजेन्द्र, अशोक, नरेंद्र व्यवसाय २० वर्ष की उम्र में महाराजा किशन गढ़ मिल के डायरेक्टर आपके हाथ के नीचे १५०-२०० लोग काम करते थे | हंगरी एवं अंग्रेजों से भी कुशलता पूर्वक व्यवहार सम्पन्न कर लेते थे | सोनगढ़ गमन राजस्थान के एक ब्र. सोनगढ़ होकर किशनगढ़ आये थे वे सोनगढ़ के स्वामीजी की प्रशंसा कर रहे थे | पाटनी जी की मां का उपवास था | २५ वर्ष की उम्र में अनुभव प्रकाश मिलने के १ वर्ष वाद सोनगढ़ पहुँच गये थे | सन १९४३ में पाटनी जी पहली वार सोनगढ़ गये थे | हिन्दी आत्मधर्म प्रथम अंक छपने के १ माह में ही पहुँच गए थे | पता गयात न था ५ दिन तक भटकते -२ पहुंचे भोजन तक ख़त्म हो गया परन्तु धुन न छोड़ी सन १९४३ में पाटनी जी पहली वार सोनगढ़ गये थे | अंक छपने के १ माह में ही पहुँच गए थे |१९४६ में गंभीर चन्द्र जी वैद्य गये थे |-अभिनन्दन स्मरनिका प्रु -७२ पाटनी जी को दृष्टी मिलने पर सोनगढ़ से किशनगढ़ लोटते में मोक्षमार्ग प्रकाशक पूरा पढ़ लिया था | जयपुर स्मारक सन१९६४ से गोदिकाजी से मिलने के बाद श्री टोडरमल स्मारक भवन की योजना बनाई तभी से आप मृत्यु पर्यंत जुड़े रहे | १९६७ में इस भवन का उदघाटन करने गुरुदेव श्री पधारे तब इसे सँभालने वाले विद्वान को खोजने का विकल्प आया जिसे पूरा करने खिमजी भाई एवं गोदिकाजी इंदौर गए थे तब डॉ साहब को लाया गया |और दशहरा के दिन १९६७ में आपने यहाँ का कार्य भार सम्हाला | आपका गुरुदेव श्री के तत्व गयान के प्रति समर्पण मयी व्यक्तित्व दिखाई दिया | रचनात्मक काम प.टोडरमल स्मारक के स्थापक सदस्य, मंत्री - परमागम प्रतिष्ठा में सम्भवतय: सोधर्म इंद्र बने थे ४०००/- में एवं ४०००/- व्यय किये विद्वत परिषद् के अधिवेशन में |१९५६ में उत्तर भारत की तीर्थ यात्रा एवं १९५९ में दक्षीण तीर्थ यात्रा | अनेकों पञ्च कल्याणकोण की सफल व्यवस्था | खानियातत्व चर्चा में प. फूल चन्द्र जी के मुख्य सहायक | मोक्षमार्ग प्रगट करने का उपाय – तत्व निर्णय, शास्त्रों के अर्थ समझने की पद्धति, पंचम गुन्स्थान वर्ती श्रावक एवं उसकी ११ प्रतिमाएं, णमो लोए सव्वसाहूणम सुखी होने का उपाय आदि अनेकों पुस्तकें | प्रेरक प्रसंग १- सोनगढ़ पर्मागम पञ्च कल्याणक प्रतिष्ठा समय बहनोई बीमार हो गये साऋ व्यवस्था देखते रात को भावनगर जाते सुबह ५ बजे तक रहते और फिर कार्यकरम की व्यवस्था सम्हालने आ जाते थे | २- सेठीनगर जयपुर पञ्च कल्याणक प्रतिष्ठा समय ५१ वर्षीय पुत्र सुरेन्द्र कुमार जी का देहावसान हो गया परन्तु आपने डॉ साहब को श्मसान घात से फ़ौरन प्रवचन के लिए रवाना कर दिया | ३- जयपुर में १९६५-६६ में स्मारक में वेदी प्रतिष्ठा थी उस समय कर्फ्यू लगा था फिर भी आपकी सूझ बूझ से अंतिम दिन जुलुश निकल सका इसका श्री आपको ही जाता है | ४- बनारस में रंगून से आये १२ यात्री संघ के साथ यात्रा करना चाहते थे आपने यात्रिओं को खड़े रह कर एवं उन्हें धर्म लाभ लेने की व्यवस्था की थी उन्होंने सम्मेद शिखर जी की वन्दना की | ५- गुजराती अनुभव प्रकाश सोनगढ़ से छपा देख आश्चर्य हुआ जरुर कोई तत्व अभ्यासी होना चाहिए इस जिगयासा से प्रथम वार सोनगढ़ १५ दिन रहे और मोक्षमार्ग प्रकाशक परप्रवचन सुने | लोटे में नै दृष्टी अनुसार मोक्षमार्ग प्रकाशक पूरा ट्रेन में पढ़ लिया था | ६- भिंड शिविर में कमला भारिल्ल जी को प्रवचन में लेट होने के कारन सभी के सामने डांट दिया था यहाँ क्या तुम्हारा घर है जो सब को चाय बना कार देने में लेट हो जाती हो | मूल कार्य कभी न छोड़ना चाहिए | फिर प्रेम से समझा कर भोजन भी कराया | अपनी बेटी की तरह समझाया वह याद रहेगा | ७- १९७१ में प्रशिक्ष्ण शिविर में गुरुदेव पधारे थे | ४-५ हजार लोग थे | एक दिन तेज हवा में पांडाल उखड़ गया, भोजन पांडाल में आग लग गई | तब भी रात भर काम करके सुबह की प्रवचन सभा तक पांडाल लग गया, चरों भोजन शाळा प्रारम्भ हो गई | चेहरे पर शिकन नहीं थी | ८- अहमदाबाद २० वा शिविर उदघाटन से पूर्व रात्री ३ बजे मूसलाधार वारिस घबरा गये मंच पर दरी लपेट कर साड़ी जिनवाणी को पानी से बचा रहे थे | लाईट ठीक कराई, पांडाल में से पानी न टपके, रेत डलवाई ताकि लोग बैठ सके | १ बजे घर गये और ३ बजे फिर आ गये रात भर काम किया परन्तु सही समय पर ध्वजारोहण हुआ और उदघाटन हुआ यह उन्ही के कारण सम्भव हुआ | ९- उनका आदर्श – बोलो मत, काम को ही बोलने दो | १०- १९४३-४४ में मख्खी परेशान करती थी तो एक नोकर मख्खी भगाता था पंखा झलता था गुरुदेव ने गोचरी को जाते समय देख लिया था | गुरुदेव बोलते थे – इन्हें तो एक मख्खी भगाने वाला चाहिये | ११- सोगानीजी आदि १५-२० लोगों को अपने खर्चे से आत्मधर्म पत्रिका का ग्राहक बना दिया था | सोधर्म इंद्र बने थे ४०००/- में एवं ४०००/- व्यय किये विद्वत परिषद् के अधिवेशन में |