Vidhwan

रामजी भाई बापुजी, राजकोट

जन्म – अवसान जन्म स्थान-गोंडल(काठियाबाड) १८८७ - १९९१ कुल आयु १०४ वर्ष चेम्बूर (तत्कालीन राजा- भगवत सिंह) माता-पिता का नाम माता का नाम – अगयात | पिता का नाम – माणेक चन्द दोशी | 2 बहिन थीं, एक बहिन झबक बेन गरीब स्थिति एवं अंधी हो गई थी, सोनगढ़ में मरण | पत्नी का नाम पहली – श्रीमती मणिबेन –इनकी सन्तान १- नवलवेन(छोटी उम्र में गुजर गई) २- श्रीमती सुखीबेन ९१ वर्ष ३- शांताबेन दूसरी पत्नी धनकुंवर बेन- सन्तान १-सुमनभाई (२९ सित १९२६-१७ फर-२०१४), दूसरी संतान – रमाबेन 3- बीजुबेन | शिक्षा १५ वर्ष की उम्र में गरीब स्थिति थी गोंडल में स्ट्रीट लाईट में पढ़ते थे जहाँ से मेंट्रिक किया था | बोम्बे बोर्ड से ४५०० छात्रों में आप मेंट्रिक में १७ वी रेंक से पास हुए थे | गोंडल स्टेट में ५ वर्ष १५/- रु प्रति माह वेतन पर क्लर्क पद पर काम किया | फिर राजकोट आना हुआ तब अमृतलाल बक्सी वकील राजकोट के परिचय में आने पर उन्होंने इस होनहार विद्यार्थी को अपने पास एक वर्ष का एडवोकेट-वकालत (वेरिस्टर की डिग्री लन्दन से होती थ) की डिग्री कराई थी | बी.ऐ., एल एल बी नहीं की थी | परिश्रमी एवं ईमानदारी से कार्य किया तो सफलता मिलती गई | ढेबर भाई कांग्रेस अध्यक्ष ने आजादी मिलते ही स्वतंत्र राज्य गुजरात बनने पर मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव रखा न मानने पर हाई कोर्ट में चीफ जस्टिस बनने का प्रस्ताव भी ठुकरा दिया था | ढेबर भाई के सामने एवं गुरुदेव श्री की साक्षी में ही राजकथा का त्याग कर दिया था | फिर ढेबर भाई प्रथम सी एम बने | वैवाहिक जीवन एवं धार्मिक शोध आपकी पहली शादी लगभग १९०९ में २२ वर्ष में मणिबेनश्री से हुई परन्तु वह ३ सन्तान होने के बाद गुजर गई तब ३७ वर्ष की उम्र में सन १९२४ में दूसरा विवाह धनकुंवर से हुआ जो ४२ वर्ष की उम्र में १९३० में तीसरी संतान बीजूबेनश्री को १२ दिन का छोड़ कर गुजर गई | फिर आपने विवाह न करने का फैसला किया | उस समय प्रथम संतान सुमनभाई ढाई वर्ष (२९ सित १९२६), दूसरी संतान – रमाबेनश्री | जूनागढ़ की एक विधवा माणेकबेनश्री को रोजगार की आवश्यकता थी उसने आपकी संतानों को पाला | विनय भाव एक दिन सभा में – गुरुदेव ने पूछा – बापुजी ! गुरु से गयान होता हैं कि नहीं ? बापुजी मौन रह गये, कुछ कहते न बना तो गुरुदेव ने पुनः कहा जबाब डॉ जानते नहीं फिर बोलते क्यों नहीं ? बापुजी - साहेब ! (भक्ति से) हूँ केवी रीते कहूँ, हूँ जाणू छुं पण जवान उपड़ती नथी | निष्पृहता १- पुत्र की आय अच्छी थी उन्हें अच्छा नहीं लगता था कि सोनगढ़ में रहते समय थेगड़ा लगे वस्त्र भी पहिन लेते थे | यह उनकी सादगी को बतलाता हैं | अनावश्यक वस्त्र एवं धन व्यय नहीं करते थे | २- दिल्ली वाला सेठ बढ़िया चावल लावे तो बिना पैसे दिए न लेवे | भावनगर से मौसंबी का रस आता था | और स्वतः कोई फल देवे तो मात्र १ फल रखते शेष समस्त वापिस कर देते थे | ३- आपकी सादगी इसी से मालुम होती हैं की आप जैसा धनी एवं प्रसिद्ध व्यक्ति के कमरे में संस्था के प्रधान होने पर भी मात्र १ खाट, १कुर्सी, १ टेबल थोड़े से वर्तन | आपके माकन में लेत्रिंग की तक सुविधा नहीं थी खुले में ही जाते थे | ४- मंदिर से गर्म पानी लेते थे उसका भी पैसा देते थे | ५- श्री मलूक चन्द्र भाई रसोड़ा का काम सम्हालते थे | रामजी भाई के यहाँ रसोई बनाने वालीनहीं आई तो उन्होंने भोजन बना कर भेजा जिसमें २ सब्जी एक कठोत , रोटी चावल भेजा | नाराज हुए क्या आज सभी के लिए यही बना हैं | नहीं तो मेंरे लिए विशेष क्यों ? मैं खाने पीने नहीं मात्र आत्म कल्याणार्थ आया हूँ | १ सब्जी १ कठोत रोटी रखकर शेष वापिस भेज दिया | भोजन का भी पैसा चुकाते थे | प्रधान होने पर भी कोई उनकी खुशामदी नहीं कर सकता था | संस्था से २ (८ पैसे) आने के केले भी लेते थे तो पैसा चुकाते थे | शील बाई भोजन बना कर चली जाती तब आ कर ठंडा भोजन करते थे | परन्तु शील का उल्लंघन नहीं किया | स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गांधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन में नामक कानून तोड़ने पर रामजी भाई को २१ दिन को जेल में डाल दिया था वहां नाटक समयसार एवं कलश टीका पढ़ी थी | विरोधी कहते थे विरोधी कहते थे – कि २ शेर वश कर लिए १- रामजीभाई दोशी न. एक का वकील धीमंत एवं दूसरा- नानालालभाई जसाणी श्रीमंत | अतः गुरुदेवश्री सफल होते चले गये |