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स्व.पंडित चैनसुखदास जी ‘न्यायतीर्थ’
जन्म तिथि वि.स. माघ कृ अमावस १९५६ ,२२ जन १९०० भादवा ग्राम राज.-----------------मृत्यु – २५ जन १९६९ | ४ वर्ष की आयु में एक पैर में लकवा हो गया था | माता-पिता का नाम जवाहरमल रावका शिक्षित एवं स्वाध्यायी थे | १३ वर्ष की उम्र में पिताजी का महामारी में देहावसान हो गया था | गरीबी थी | शिक्षा ५ वर्ष में प.रामचन्द्र जी के पास शिक्षा प्रारम्भ | १९१४ में गया में स्यादवाद महाविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की थी | परिवार व्यवसाय कुचामन सिटी में जैन विद्यालय में अध्यापक थे |कवि थे | गुरुदेवश्री का परिचय सोनगढ़ से बहिन श्री चम्पाबेन आदि १ फर १९४० स्नान कर जिनमन्दिर के दर्शन करने के बाद अपनी भावना बताई तो लोगों ने प्रतिष्ठित विद्वान प. चेनसुखदास जी न्यायतीर्थ का परिचय दिया | उनके सोजन्य से रामचन्द्र नाहटा जयपुर के यहाँ से ३ निर्दोष प्रतिमा पसंद की और और तत्काल पीछे चादर लगाकर उनका फोटो उतराया | वह फोटो आज भी बेनश्री के कक्ष में सूरक्षित शोभायमान हो रहीं हैं | एवं प्रतिष्ठा की समस्त सलाह आपसे ही मिली थी | रचनात्मक कार्य मुख्यमंत्री डॉ हीरालाल शास्त्री चैनसुखदासजी के मित्र थे | राजस्थान विश्व विद्यालय खुल रहा था | १९४७ में लाल बहादुर शास्त्री एवं गांधीजी जैसे स्वतंत्रता सेनानी थे सादा जीवन | इतिहास | बरैया जी का योगदान जैसा मुरेना के लिए थे | वैसा ही योगदान यहाँ के विद्यालय के लिए चेनसुखदासजी का है | आपने ही डॉ हुकम चन्द्र भारिल्ल जी को प.टोडरमल जी पर पी एच ड़ी करने की समाज के सामने आगया दी थी | उनकी सारी समाज में आगया चलती थी | समाज स्वामीजी का विरोध करना चाहती थी | आपने कहा करके देखो मैं एक भी मुनि कोनही घुसने दूंगा | आपके मित्र भूरामलजी (आ.गयानसागर) भी आपके पास गृह्स्थावस्था में मिले उन्होंने अपनी किताबें भी दिखाई थी | ‘शारदा संस्कृत’ नामक पत्रिका में आपकी कवितायें एवं लेख छपते थे | वीरवाणी समाचार पत्र निकाला था | जैन दर्शनसार एवं सर्वार्थ सिद्धि लिखी जो राजस्थान महाविद्यालय जयपुर में एम् ऐ. के पाठ्यकरम में पढ़ाई जाती हैं | १- टोडरमल स्मारक भवन जयपुर का निर्माण आपकी प्रेरणा से अ.भा.जैन परिषद् राजस्थान की प्रदेश शाखा का गठन आपके द्वारा किया गया हैं | १९४७ में मुल्तान निवासी दिग जैन भाईओं को जयपुर में शरण दी थी | दिल्ली जयपुर मंदिर में मुल्तान की प्रतिमा एवं शास्त्र भंडारों को आदर सहित प्रतिष्ठित किया गया | २- राजवार गोडावाटी प्रांतीय सभा का गठन किया | इसके माध्यम से दहेज, कन्या विकरय,मृत्यु भोज, अनमेल विवाहन्यायालय के आप मंत्री थे | बंद कराया | ३- माधुरी,सुधा साप्तहिक अर्जुन,दैनिक अमर भारत में आपके लेख छपते थे | जैन विजय के आप सम्पादक रहे | जैन दर्शन, जैन बंधू , वीर वाणी के सम्पादक रहे | ४- ३० अक्टू १९३१ को आप जैन संस्कृत कालेज के अध्यक्ष बने | आपके आने के पूर्व ४४ वर्ष में १० विद्वान तैयार हुये परन्तु ३० से १९६७ तक १५० से अधिक आचार्य तैयार हुये हैं | ५- संयम प्रकाश एवं प्रद्युम्न चरित का संपादन किया | प्रेरक प्रसंग राजस्थानमें प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल जी शास्त्री थे जो संस्कृत प्रेमी एवं गयाता थेअतः शास्त्री का कोर्स प्रारम्भ किया गया | आपकेही मित्र थे प. चेनसुखदास जी उनसे आपने कहा कि तुम भी अपने धर्मका विभाग खोल दो | सभी अन्य धर्म के विभाग खुले थे | धन्यपल था की ज्यादा ऊहापोह में न फंसा | सारीतैयारी हुई औरसम्पूर्ण देश में राजस्थानही एक मात्र ऐसा राज्य है जहाँ जैन धर्म से शास्त्री करके बी ऐ डिग्री कर सकते हैं | संस्थाओं के लिये धन लेने से भी अपने विचारों हत्या होती है | हाँ में हाँ मिलना पड़ता है | आत्म गौरव नष्ट करना है | वे मात्र सरस्वती उपासक रहे | सेठ मित्र के नोट फेंक दिए और जम कर डांटा था कि धन से आप लोगों ने विद्वानो को खरीद लिया है | सर्वश्रेष्ठ शिक्षक का राष्ट्रीय अवार्ड १९६७-६८ के लिये प्राप्त हुआ था | श्रद्धांजलि प.चैनसुखदास न्यायतीर्थ जयपुर वनारस पृ २ इसमें कोई शक नहीं कि श्री कानजीस्वामी के उदय से अनेक अंशों में क्रांति उत्पन्न हुई हैं | पुराना पोपडम खत्म हो रहा है और लोगों को नइ दिशा मिल रही है | यह मानना गलत है कि वे एकांत निश्चय के पोषक है | हम सोंनगढ में सर्वत्र फेले हुये उनके अनुयायिओं में निश्चय तथा व्यवहार का संतुलन देख रहें हैं | सौराष्ट्र में अनेकों नवीन मंदिरों का निर्माण तथा उनकी प्रतिष्ठायें स्पष्ट बतलाती हैं कि वे व्यवहार का अपलाप नहीं करते | भ.कुन्दकुन्द के वे सच्चे अनुयायी हैं | जो उनकी आलोचना करते हैं वे आपे में नहीं हैं व उन्होंने न निश्चय को समझा है और न व्यवहार को और सच तो यह है कि जैन, शास्त्रों का हार्द ही उन्होंने नहीं समझा | कानजीस्वामी विवाद में नहीं पड़ना चाहते, पर अपना काम करते जाते हैं | सोनगढ़ से जो धार्मिक साहित्य निकल रहा है, उससे स्वाध्याय का बहुत प्रचार हुआ है | कुछ लोग किसी भी विषय को आंदोलन का रूप दे देना चाहते हैं | श्री कानजीस्वामी के विषय में ऐसा ही हुआ है | निमित्त उपादान तथा करमबद्ध पर्याय आदि दार्शनिक चीजे हैं | विद्वानों के समझने की हैं | ऐसी चीजों को आन्दोलन का विषय बनाना समाज की शक्ति को क्षीण करना है | हमें प्रत्येक प्रसंग को निष्पक्ष दृष्टि से देखना चाहिये | आपका प्रयत्न प्रशंसनीय है | वीर वाणी १९६७ से साभार