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पंडित श्री कैलाशचंद्र जैन
१ माता का नाम श्रीमती भरतो देवी जैन | २ पिता का नाम श्री मिट्ठनलाल जैन (निवासी टीकरी पहले जिला मेरठ अब जिला बागपत) | ३ जन्म सन् १९१३ या १९१६ में | ४ भाई बड़े भाई – बाबुरामजी पहले अम्बाला बाद में दिल्ली में रहने लगे | छोटे भाई – शीलसागरजी पहले सहारनपुर बाद में हैदराबाद रहने लगे | ५ बहिने बड़ी – जैनमति | छोटी – शील मति (इनके पति सरनाराम जी के भाई थे)| ६ शिक्षा मथुरा चौरासी में ३ वर्ष पश्चात सहारनपुर के जम्बू विद्यालय में | ७ व्यापार पहिले दिल्ली फिर लाहौर पश्चात देश विभाजन के कारण बुलंदशहर में आकर आजाद किराना स्टोर्स नाम से दुकान खोली | ८ विवाह १९ वर्ष की उम्र में दरियागंज निवासी श्री सुगनचंद जी की सुपुत्री विमलादेवी के साथ हुआ, जब पवन जी १७ वर्ष के थे तब लगभग सन् १९६८ में उनका स्वर्गवास हुआ | ९ बच्चे भाई-बहनों में सबसे बड़ी कुसुम, कांता फिर तीसरे नम्बर पर भाई (इनका बचपन में ही स्वर्गवास हो गया था), बहिन शांति, बहिन विनय, और पवन जी १० आजीवन ब्रह्मचर्य सन् १९५३ में यात्रा संघ में पावागढ़ में आजीवन ब्रह्मचर्य अंगीकार किया जिसे गिरनार तीर्थ आने पर फिर से दोहराया | ११ गुरुदेवश्री से परिचय सन् १९५३ के यात्रा संघ में जब अहमदाबाद पहुचे तब कुछ लोग कानजी स्वामी को महान सन्त, और कुछ लोग महान धोखा कहने लगे, तब आपको लगा कि कानजी स्वामी अवश्य महान संत है, मुझे उनसे मिलना चाहिए | पहली बार प्रवचन सुनकर गुजराती भाषा होने से कुछ भी समझ नहीं आया तथापि यह लगा कि जिसकी मुझे तलाश थी वह मुक्ति विधाता मुझे मिल गये है | १९५६ में तीसरी बार जब ढाई महीने के लिये सोनगढ गए यही से उनके अध्य्यन-मनन का सिलसिला प्रारंभ हुआ | कुन्दकुन्द प्रवचन मंडप के एक कमरे में रहते थे | सोनगढ़ में ही सम्य्कदर्शन हुआ | गुरुदेव को बताया था | उस दिन की सायं की चर्चा में गुरुदेव ने कहा कि आज केलाश चन्द्र ने बताया था | १९७१-७२ में चेतन विजय महाराज साधू रूप से दिग में परिवर्तित हुए थे आपसे बहुत प्रीति रखते थे आपका ध्यान रखते थे | वहीँ रहते समय हुए बड़ी बेटी ससुराल में गुजर गई | समता रखते हुए गुरुदेव को बताया कि धर्म करती तो अच्छा होता | एक वार आप बीमार हो गये तब गुरुदेव मध्यान्ह में आप को देखने कुन्दकुन्द प्रवचन मंडप में देखने आये तब आपको लगा कि अब देह छूट जायेगी | भावनगर या सीहोर से डॉ बुलाया गया | बुलन्दशहर में गुरुदेव पधारे थे | जिसका आमंत्रण फिरोजाबाद में आकर मुकुटलाल जी आदि कई लोगों ने दिया था | तब गुरुदेव बोले – संघ की तो संघाधिपति जाने मैं तो कल इतने बजे तक पहुँच जाऊँगा | वहां गुरुदेव का जूलूश निकला साथ ही मोतीबाग़ में गुरुदेव का नागरिक अभिनन्दन एवं प्रवचन रखा गया | सोनगढ़ में रात को १२ बजे सोते एवं सुबह ३ बजे उठकर फिर स्वाध्याय करते और अन्य को ४ बजे उठाकर कक्षा लेते | १२ निवृत्ति १६-०४-१९६५ को दुकान का सम्पूर्ण दायित्व श्री शीतल प्रसाद जैन को सम्ह्लाकर आपने तत्व प्रचार हेतु सम्पूर्ण देश का भ्रमण किया |