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सर सेठ हुकमचंद्र इंदौर
जन्म तिथि पूर्वजों की भूमि लाडनूं जिले की मेंडसिल ग्राम हैं स. १८४४ में सेठ पूसाजी अपने दोनों पुत्रों के साथ श्यामाजी एवं कुश्लाजी के साथ व्यापार हेतु इंदौर आना हुआ | स. १९३१आषाढ़ सुदी १ को जन्म माता-पिता का नाम सरूप जन्म श्रीमती जंवरी वाई शिक्षा मोहनलाल गुरूजी से आरम्भ | लिखापढ़ी सीखी |रुई सोना में संसार के बाजार में खलबली | परिवार ४ विवाह १- स.१९४३ में मंदसौर के जोधराज कि पुत्री से हुआ | एक लड़की जन्मी रत्नप्रभा झालरापाटन विवाहि गई | परन्तु इसे २ साल ६ माह में छोड़कर अवसान को प्राप्त हो गई | स. १९५६ में जो ६३ में गुजर गईं | ६३ में फ़ौज मल भोपाल की पुत्री कंचन बाई | स,६५ में तारामती जन्मी जिनका विवाह अजमेर के भागचन्द्र जी से हुआ | इस विवाह के बरातिओं को ठहराने के लिये १ लाख रु में मोतीमहल बनवाया गया था | स. ८५ में २ संतान छोड़कर गुजर गईं | ७० में राजकुमार का जन्म हुआ | स. ८४ में राजकुमारी से विवाह हुआ | इनके २ पुत्र हुये स. ७२ में चन्द्र प्रभा का जन्म हुआ | सबसे छोटी बेटी स्नेह राजा बाई तीनों विवाह एक साथ हए १८ दिन तक रसोई म् ५-७ हजार लोगों की हुई एक बड़ी रसोई २५ हजार लोगों कि हुई | इंदौर के पन्नालाल मल्हारगंज वालों कि पुत्री से विवाह हुआ |परन्तु १ वर्ष बाद मद्रास में विषम ज्वर से म्रत्यु हो गई | सन १९५६ में कुंवर हीरालाल को अजमेर से दत्तक लाये | इनका विवाह १७ वर्ष कि उम्र में कर दिया | व्यवसाय १५ वर्ष में व्यापार में कुशल | गुरुदेवश्री का परिचय बैशाख वदी ६ से ८, २ से ४ जून ४५ शनिवार से सोमवार तक भागचन्द्रजी सोनी अजमेर की प्रेरणा से सर सेठ हुकमचन्द्र इंदौर सोनगढ़ पहली वार पधारे | इष्टजनों सहित स्पेशल रेल के सेलून में आये जो उस समय अंग्रेजो के अलावा मात्र विशेष राजा-रजवाड़ों को ही मिलती थी | उस समय लन्दन एक्सचेंज में उनका फोटो लगा था शायद अभी भी लगा हो, उनके साइन मात्र से हुंडी भुन जाती थी या उधार मिल जाता था | रचनात्मक कार्य १- आपने हिंदी आत्मधर्म छपाने का अनुरोध किया था | १००१/-रु. जमा भी कर दिया था | जबकि उस समय आजीवन शुल्क का जैन समाज में प्रचालन नहीं था | निश्चितरूप से यह एक बहुत प्रोत्साहक अवसर रहा जिससे अनेकानेक हिंदी भाई-बहनों पर जादू का सा असर डाला | सारे देश को गुरुदेवश्री से जोड़ने में सबसे ज्यादा अहम रोल निभाया हैं इस पत्रिका ने | २- ४ जून के दिन जाते-२ आपके हांथों से एक पवित्र कार्य हुआ वह हैं नानालाल भाई जसाणी द्वारा चांदी के ३१ पत्रों पर समयसार की ४१५ गाथाओं का प्राकृत लिपि में अंकित होकर विराजना | जिसके वंदित्तु का अनुस्वार माणेक से जड़ाया गया था | अभी तक किसी ने आपको दान देने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष दान की अपेक्षा नहीं की थी | तब आश्चर्य हुआ कि देश में कहीं भी जाओ तो दान की अपेक्षा में बड़ी खुशामद होती थी/है | ३- स्वाध्याय मंदिर को स्वाध्याय हेतु बहुत छोटा जान कर राजकुमार काशलीवाल ने ७१०१/- सर सेठ हुकमचन्द्रजी ने २५००१/- और अन्य परिजनों ने १०००१/- दान में दिया | जिससे श्री कुन्दकुन्द स्वाध्याय मंडप बनाया गया | साथ में देवकी नंदन एवं वंशीधरजी शास्त्रीजी भी पधारे थे | ४- फागुन सुदी ३, २१-२-४७ सोमवार श्री कुन्दकुन्द प्रवचन मंडप का उद्घाटन सर सेठ हुकमचन्द इंदौर ने ३५००१/-देकर किया | रेल सेलून में ४५ लोगों के साथ आये थे | इसी दिन गुरुदेवश्री एवं सभी लोग गये बीछिया के जिन मंदिर का शिलान्यास भी सेठजी के हाथों संपन्न हुआ | उन्होंने भरी सभा में कहा- “धर्म प्रभावना में मेरी सारी संपत्ति भी लग जावे तो भी कम हैं | ऐसे पवित्र प्रसंग में भाग लेने हेतु मैं दिन-रात तैयार हूँ, जैन धर्म का डंका सारे हिन्दुस्तान में बजे | जीवन भर में मैंने ऐसी भक्ति नहीं देखी | आप आधी रात को भी याद करोगे तो भी मैं आऊंगा |”--------///???guruprasad me maatr –“आपके पास मोक्ष जाने का सिद्ध रास्ता हैं |” ५- सन १९२३ में सम्मेद शिखर यात्रा सवा लाख खर्च १ लाख दान ५००० लोगों को भोजन | ६- कांच का मंदिर स. १९७८ में कनीराम चम्पालाल का मकान लेकर जयपुर ईरान के कारीगरों ने कांच का मंदिर बनाया |स.१९६९ में शिलान्यास ९ साल में बन कर तैयार हुआ | ७- सम्मेद शिखर में स.१९५६ अंग्रेज वस्ती वसने का विचार आया आपने निर्भीक होकर कहा कि १५लाख जैनों का खून बह जाएगा | आप वहां शिकार करेंगे रात्री भों करेंगे | आखिर छोटो लोट साहब ने निरस्त कर दिया | २३ अगस्त १९८७ स. १९६७ में पहाड़ खरीदने की बात पर आपने ५००० दान दिया इंदौर से २५०००- अभिनन्दन ग्रन्थ से साभार अखिल भर.दिग जैन महासभा द्वारा समर्पित |-१३ मई रविवार १९५१ को प्रकाशित प्रकाशक जैन महासभा नई दिल्ली | प्रेरक प्रसंग एक दिन गुरुदेवश्री सर सेठ हुकमचन्द से बोले- सेठ तमारु आ १७ लाख नूं हार मने पाथरा नी जेम लागे छे | सेठ बोले- साहेब ! सही फ़रमाया | सर सेठ हुकमचंद इंदौर ......पृ-६१ (१०००० व्यक्तिओं की पर्युषण सभा में कहा था) यदि हमें वास्तव में सत्य दिग. जैनधर्म का स्वरूप जानना है, तो इस युग के दिग. जैन धर्म के सच्चे प्रचारक सोनगढ़ के संत का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करना चाहिये | १९०० के लगभग ३ वर्ष की उम्र में रायबहादुर सेठ हीरालाल कासलीवाल आपके यहाँ गरीब घर से गोद आये थे बाद में आपकी सन्तान राजकुमार कासलीवाल का जन्म होने पर भी आपने प्यार में अंतर नहीं किया कल्याण मॉल जी की सम्पत्ति का वारि बनाया साथ ही १ करोड़ रुपया और दिया | १९४६ में सट्टा त्यागा | बोम्बे में सराफा के व्यवसाय में आपको इतना लाभ हुआ परन्तु अन्य समस्त व्यापारियों को घाटा हुआ परन्तु आपने अपने समस्त सोदे रद्द कर उन्हें राहत पहुचाई | कर्म चारियों पर चौकस नजर रखते थे उन्हें सख्त दंड भी देते थे और उन्हें पीछे से गेहूं अनाज आदि भी पंहुचा देते थे | धनिया पत्ती आई चटनी न परोसी गई तब आपने न परोसने का कर्ण पूछा तब उत्तर मिला नहीं आई उन्होंने फोरन कहा परन्तु आज की सब्जी के बिल में तो लिखी हैं फोरन दंड देने के लिए कर्म चारी को बुलाया और १ रु का दंड दिया पीछे से उसके घर में सामान पहुंचा दिया | कल पर कोई काम न छोड़ते थे आधी रात को बैठकर अगले दिन के खरीदी के तार तैयार कराते थे , गफलत हो तो सभी को ज्गाकार हिस्स्ब देखते थे जब तक हिसाब नहीं मिलता न स्वयम सोते न सोने देते थे | १०-१५ आख की जायदाद से १०-१५ करोड़ की कमाई की | जैन जागरण के अग्रदूत पृ - ५८३ तीनों भाइयों में शान्ति से बिना विवाद के बटवारा हो गया | लन्दन स्टोक एक्सचेंज में आपकी फोटो लगी हैं | आपके हस्ताक्षर से वहां उधार मिल जाता था | आपके नाम की हुंडी चल जाती थी | साभार - रावराजा सर सेठ हुकमचन्द्रजी का संक्षिप्त जीवन परिचय १९१८ में गांधीजी साहित्य सम्मलेन प्रयाग की अध्यक्षता इंदौर में कर चुके थे १९३५ में पुनः आमंत्रित करने पर १ लाख रु की मांग की सेठ जी ने सहर्ष दिए जिससे गांधीजी पधारे और उस राशि से हिंदी संस्थान खोला | इसी समय गांधीजी ने इसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देनी की मांग प्रस्तुत की थी | गंगा की तरह हिंदी भाषा सदा रहेगी | गांधीजी स्वयं गुजराती होने पर भी तुलसीदास के भक्त होने से हिंदी प्रेमी हो गये थे | सारे जीवन हिंदी के विकास में लगे रहे |- पत्रिका १४-९-१४ ४२८ पेज का अभिनंदन ग्रन्थ छपा जिसमे ८० लाख रूपये के दानों का विवरण ५८ पेजों में श्रद्धांजलि छपी है | इंदौर का इतिहास बाहुबली पांड्या संयुक्त महामंत्री दि.जैन समाज इंदौर १७४१ इन्द्रेश्वर मंदिर का निर्माण हुआ जिसके कारण इन्द्रेश्वर फिर इंद्र पुर फिर इन्डूर तथा १९ वि सदी में इंदौर पडा |मूलभूत रूप से १७६६ में मल्हार राव द्वितीय के कार्यकाल में राजधानी बना | यह छोटा सा कस्व था | महेश्वर एवं भानपुरा भी कुछ समय राजधानी बना | १८१७ में पुनः राजधानी बन गई | १७८८ में इतने जैन आने लगे थे जिससे १८३८ में पहला लश्करी जैन मंदिर गोराकुंड स्थित बना | १९११ में १४३९, १९२५-२६ में २५२६ १९३५ में ५००० १९६० में १०२३० जैन थे | यहाँ गांधीजी सेठजी के घर २ वार एवं मदन मोहन मालवीय २ वार नेहरूजी इन्द्राजी आते रहें हैं | अंग्रेजों से भी आपके सम्पर्क या राजनैतिक सम्बन्ध रहें हैं | १९१८ में हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता गांधीजी ने की थी उसी समय साहित्यकारों को ठहराने के लिए अस्थाई नगर का नाम हुकमचन्द्र नगर रखा गया था | १९३१ में बोम्बे में स्वदेशी आन्दोलन के अग्रेषर थे | मई में बिलायती वस्त्रों के बहिस्कार का निश्चय आपकी अध्यक्षता में हुआ था | स्व.जमनालाल बजाज ने पत्र लिखकर स्वदेशी उत्पादन उपयोग के तहत खादी के प्रयोग पर बल देने एवं प्रचार प्रसार करने को कहा | १९३३ में स्वदेशी प्रदर्शिनी के स्वागत अध्यक्ष के रूप में कहा खादी ही इस देश का प्राण है | ...यह देश के कृषकों का रक्षक है | स्वयं की कपड़ा मिलें भी थी | १९०९ में सम्मेद शिखर जी में अंग्रेज बंगला बनाना चाहते थे | आप तीनों भाई गये | अपने प्रभाव से निरस्त कराया | शक्कर बाजार स्थित मारवाड़ी मंदिर कई वर्ष पूर्व बन जाने पर भी कलश चढ़ाने के लिए महाराज होलकर एवं अंग्रेज रेजीडेंट से हुक्म प्राप्त क्र तीनों काशलीवाल वाल परिवारों ने मिलकर चढ़ाया | राजगढ़ व्यावरा में ब्राह्मणों के विवाद के चलते जैनियो के जूलूश पर रोक को दरवार राजगढ़ में जाकर ६ सित. १९१८ को जूलूश निकालने की आज्ञा ली | ईडर में सादरा महि कांठा स्थान में जैन मुनिओ के बिहार पर पाबंदी थी | ईदर महाराज के पास जाकर प्रतिबन्ध हटवाया | वहां के राजा ने आपको महल में ठहराया था | हैदराबाद में सं १९३३ में मुनि विहार प्रतिबन्ध समय स्पेशल ट्रेन से हैदराबाद नबाब से मिलने गये | आदेश बापस हुआ | १९३५ में लेजिस्लेटिव सभा ने मुनि विहार पर प्रतिबन्ध लगाया | आपने अपना हीरक जयंती समारोह निरस्त कर दिया | १९३६ में तभी मनाया जब वह विल निरस्त हो गया | १९४२ में ‘जैनी दण्डनं’ पुस्तक जैन समाज विरोधी इलाहाबाद से छप क्र आई | आपने यु पी के AG से उसका प्रकाशन रुक्बाया और प्रतियां भी जपत करबाई | इंदौर में जहाँ आज शिव विलास पैलेस हैं उसके निर्माण से पूर्व ही माणिक चौक जैन मंदिर भी था उसे गिराने का हुक्म आ गया | सेठ साहब ने अपने प्रभाव से रुक्बाया | उस मंदिर को छोड़कर ही भवन की बौन्ड्री है | १९१४ में सिद्ध्वर कूट जाने के लिए मोरटक्का उतरना पड़ता हैं | अतः वहां एक आदिनाथ जैन मंदिर एवं धर्मशाला अपने पिताजी की स्मृति में बनबाई | बनारस विश्विद्यालय में मन्दिर एवं छात्रावास निर्माण के लिए १५००० रु दिए | १९१४ में प्रथम विश्व युद्ध में घायल सैनिकों की रक्षार्थ बहुमूल्य बाहन दिया | १९११ में दिल्ली दरवार में राजाओं की तरह आपको भी क्वीन विक्टोरिया ने अपना केम्प लगाने की अनुमति दी थी | १९०२ में इंदौर शहर एवं छावनी के बीच १ लाख वर्ग फुट जमीन खरीद कर जिनमन्दिर एवं १०० आदमियों लायक धर्मशाला बनाबाई | छात्रों के लिए बोर्डिंग बनाया | संस्कृत महा विद्यालय बनाया | १९०२-३ में बडनगर में गुजरात से आये नीमा समाज के जैन बन्धु आकर बसे | जैन समाज उन्हें जैन नहीं मानती थी नीमा समाज जैन धर्म पालन करने के कारण बेटी रोटी नहीं देते थे | आखिरकार उस जैन समाज ने जैन धर्म छोड़कर नीमा समाज में जाने का फेसला क्र लिया | सेठजी को ज्ञात हुआ तो फ़ौरन आकर उन्हें खंडेलवाल एवं वेड गौत्र देकर बचाया | आज वे ५०० की संख्या में हैं | शिक्षा के लिए त्रिलोक चन्द्र हायर सेक स्कूल एवं लडकियों के लिए कल्याण मातेश्वरी कन्या विद्यालय बनाया | रामाशाह जी का मल्हार गंज जैन मंदिर १८५० में बनाया था | १९५३ में पहला बीसपंथी मंदिर मल्हार गंज में बना | सरसेठ हुकमचंद्र इंदौर १- बैशाख वदी ६ से ८, २ से ४ जून ४५ शनिवार से सोमवार तक भागचन्द्रजी सोनी अजमेर की प्रेरणा से सर सेठ हुकमचन्द्र इंदौर सोनगढ़ पहली वार पधारे | इष्टजनों सहित स्पेशल रेल के सेलून में आये जो उस समय अंग्रेजो के अलावा मात्र विशेष राजा-रजवाड़ों को ही मिलती थी | उस समय लन्दन एक्सचेंज में उनका फोटो लगा था शायद अभी भी लगा हो, उनके साइन मात्र से हुंडी भुन जाती थी या उधार मिल जाता था | २- आपने हिंदी आत्मधर्म छपाने का अनुरोध किया था | १००१/-रु. जमा भी कर दिया था | जबकि उस समय आजीवन शुल्क का जैन समाज में प्रचालन नहीं था | निश्चितरूप से यह एक बहुत प्रोत्साहक अवसर रहा जिससे अनेकानेक हिंदी भाई-बहनों पर जादू का सा असर डाला | सारे देश को गुरुदेवश्री से जोड़ने में सबसे ज्यादा अहम रोल निभाया हैं इस पत्रिका ने | ३- ४ जून के दिन जाते-२ आपके हांथों से एक पवित्र कार्य हुआ वह हैं नानालाल भाई जसाणी द्वारा चांदी के ३१ पत्रों पर समयसार की ४१५ गाथाओं का प्राकृत लिपि में अंकित होकर विराजना | जिसके वंदित्तु का अनुस्वार माणेक से जड़ाया गया था | अभी तक किसी ने आपको दान देने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष दान की अपेक्षा नहीं की थी | तब आश्चर्य हुआ कि देश में कहीं भी जाओ तो दान की अपेक्षा में बड़ी खुशामद होती थी/है | ४- स्वाध्याय मंदिर को स्वाध्याय हेतु बहुत छोटा जान कर राजकुमार काशलीवाल ने ७१०१/- सर सेठ हुकमचन्द्रजी ने २५००१/- और अन्य परिजनों ने १०००१/- दान में दिया | जिससे श्री कुन्दकुन्द स्वाध्याय मंडप बनाया गया | साथ में देवकी नंदन एवं वंशीधरजी शास्त्रीजी भी पधारे थे | ५- एक दिन गुरुदेवश्री सर सेठ हुकमचन्द से बोले- सेठ तमारु आ १७ लाख नूं हार मने पाथरा नी जेम लागे छे | सेठ बोले- साहेब ! सही फ़रमाया | ६- वंशीधरजी शास्त्रीजी तो यहाँ ही ५ माह लगातार रहे | गुरुदेवश्री कलश १७५ का प्रवचन कर रहे थे तब उन्होंने बंशीधरजी को पूछा – छाया उंगली से बनती है या नहीं | यहाँ “पर एव” नहीं “परसंग एव” लिखा है अर्थात ऊँगली से छाया नहीं बनती हैं | पुरानी दृष्टी छोड़ी और पूरा अध्ययन करने की भावना भाई | राग पर से नहीं पर संग से राग होता हैं | आपने गीता की अध्यात्मिक टीका भी लिखी हैं परन्तु समाज में वह अप्राप्त हैं |