Vidhwan

प.उत्तमचंदजी सिवनी

जन्म तिथि १ जुलाई १९४५ - माता-पिता का नाम श्रीमती जानकी बाई श्रीमान दयाल चन्द्र जैन शिक्षा एम ऐ इंग्लिश, Bed, Phd, परिवार पत्नी - श्रीमती सरोज जैन | एक पुत्र डॉ विवेक जैन(Phd-आ.समन्तभद्र का व्यक्तित्व एवं कर्तुत्व, MA-eng,संस्कृत)- दो पुत्रियाँ श्रद्धा -संजय जैन लखनऊ, भावना--मेहुल मेहता शास्त्री, सोनगढ़ व्यवसाय १९६९- जून २००६ सरकारी शिक्षक | प्राचार्य बन कर निवृत्त | गुरुदेवश्री का परिचय प्रथम दर्शन - १९६३ में झिरनों मंदिर भोपाल वेदी प्रतिष्ठा में गुरुदेव को सुना | समझ में कुछ नहीं आया परन्तु जिगयासा खड़ी हो गई | साधर्मी वात्सल्य – १९६९(२ साल तक २० दिन का शिविर अटेंड किया |) में प्रथम दर्शन पाए और पहली वार में ही ढेड़ माह रुके | सोनगढ़ में आने-जाने के किराया एवं साहित्य की राशि सिवनी पंहुचा दी थी | हिंदी में प्रवचन का आग्रह किया था | आत्मसिद्धि मिली पढ़ी और वहीं घूमते-२ प्रश्न पूछे थे | जाते समय १० घंटे बस से खड़े -२ सोनगढ़ गये थे | गुरुदेव से मिलने से पहले आलू, भटा, प्याज खाते थे | सोनगढ़ में आ.रामजी भाई दोशी , खेमजी भाई, लालचन्द्र भाई राजकोट, बाबुभाईजी के समागम का लाभ मिला | रचनात्मक कार्य सूर्यकीर्ती तीर्थंकर प्रतिमा प्रतिष्ठा के विरोध में १० लेटर पंजी.पोस्ट से सोनगढ़ भेजे थे | प्रवचन - १९६९ में पर्युषण में वारा सिवनी (बालाघाट)गये तब से समाज के मुख्य प्रभावशाली बक्ताओं में आप गिने जाते हैं | सम्पादन - योगसारजी ब्र. शीतल प्रसाद जी कृत टीका २- तत्वार्थ सूत्र टीका ३- लघु तत्व स्फोट ४- मोक्षमार्ग प्रकाशक प्रश्नोत्तर ५ भाग ५- समयपाहुड-दोनों टीका सहित ६- पंचास्तिकाय ७- शासन देव एवं जिन शासन ८- समयसार किसको और क्यों पढना चाहिए १९८० ९- रत्नाकर पच्चीसी (रत्नाकर कवी)१०- प्रवचन सार दोनों टीका सहित ११- छहढाला ४० मूल आचार्यों के ग्रन्थों में से सन्दर्भ सहित |(दोनों अंतिम ग्रन्थ सित.१४ तक अप्रकाशित हैं |)१२- निबन्ध संग्रह - १६ निबन्ध | १३- सहायक सम्पादक - सन्मति संदेश १४- स्तुति विद्या - आ.समन्त भद्र रचित | प्रेरक प्रसंग आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर रिश्तेदार तथा सामाजिक सहयोग से पढाई पूरी की शादी के समय कोई ४०००० नगद दे रहा था परन्तु नही लिये दूसरी जगह ५००० रु लेकर शादि की शादी के बाद गयात हुआ कि शिक्षक ने सोना मकान गिरबी रखकर शादि की थी तो वे भी लोटा दिये |