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श्री गांगजीभाई मोता
जन्म तिथि श्रावणसुदी पूनम स.१९९७-१४-८-१९४० माता-पिता का नाम रतनबाई पिताजी- देवशी भाई शिक्षा परिवार पत्नी –रतनबेन पुत्र – स्व नितिन गांगजीभाई मोता(५० वर्ष)पुत्रियाँ ३ – १- भारती बेन हरख चन्द्र डेडिया २- हर्षा बेन लक्ष्मी चन्द्र गडा ३- दीप्ति बेन किशोर हरिया | व्यवसाय १९९० में ५० वर्ष की आयु में व्यापार आदि से निवृत होकर श्रीमदजी एवं मूल मार्ग का स्वाध्याय एवं प्रसार करते हैं | गुरुदेवश्री का परिचय २७ वर्ष में घाटकोपर में राजचन्द्र गयान मंदिर में आये तो अच्छा लगा | पालीताणा आते थे एक वार १९६८ में सोनगढ़ आने का भाव आया तो पहला प्रवचन सुनते ही पत्नी को बोला श्री मदजी द्वारा बताये गये सारे गयानी के लक्ष्ण इनमें मिलते हैं अब यही मेंरे गुरु हैं | तब से सोनगढ़, दादर, घाटकोपर में गुरुदेव का लाभ लिया | रचनात्मक कार्य १९९० में ५० वर्ष की आयु में व्यापार आदि से निवृत होकर श्रीमदजी एवं मूल मार्ग का स्वाध्याय एवं प्रसार करते हैं | अभी तक १०००० प्रवचन रिकॉर्ड हो चुके हैं | समय-२ पर देश के अनेक नगरों में जाकर प्रभावना करते हैं | विदेश जाने का त्याग हैं | लगभग २०० व्यक्तिओं ने मिलकर यहाँ (कुकमा) में एक बड़ा संकुल बनाया है जहाँ आपने अपना निवास, मंदिर स्वाध्याय भवन बनाया है | स.१९३७ में खेंगार जी महाराव के आमंत्रण से श्रीमदजी कच्छ पधारे थे तब यहाँ से गुजरते समय गाड़ीबेल से चलते समय बेलों को पानी चारा खिलने के एवं स्वयं विश्राम को रुके थे | १९९६ में इसी स्थान को खरीद कर संकुल बनाया | इसी वर्ष दिसम्बर में शिलान्यास हुआ | सं २००० मार्च से विधिवत आप यहाँ रहने लगे | २००४ में स्वाध्याय मंदिर बन गया | जिनमन्दिर २००७ में मंगलायतन के दिश निर्देश में ब्र. पंडित अभिनन्दन जी के कुशल प्रतिष्ठाचार्यत्व में प्रतिष्ठित हुआ | यहाँ जिनमन्दिर एवं प्राकृतिक वातावरण आत्म आराधना के अनुकूल है | मंदिर एवं श्रीजी की छटा देखते ही बनती है | प्रेरक प्रसंग प्रथम वार राजकोट में स्वामीजी द्वारा ३२० वि गाथा पर जयसेन आचार्य की टीका पर प्रवचन की इच्छा देखते हुए कि जयसेन आचार्य की टीका पर प्रवचन करना है गुजराती में उपलव्ध न होने पर भी लालुभाई ने सोनगढ़ आदमी भेजकर चुपचाप हिम्मतभाई से इसका अनुवाद करवा के मंगाया एवं छपाकर प्रवचन समय सभी के हाथों एवं गुरुदेव के सामने विराजा तो देखते ही गुरुदेव को रोमांच हो गया | बड़े आनंद से प्रवचन हुआ | उस समय आप भी वहाँ थे ८ दिन की शिविर चल रही थी | तीसरे दिन गुरुदेव ने ना पाड़ी कि इतना सूक्ष्म विषय न चल सकेगा, सभी विद्वान सायं बेठे थे तो सभी ने कहा ठीक है तब लालचंद अमरचन्द्र मोदी बोले साहेब आप शेर हो, आप नहीं कहोगे तो कौन कहेगा ? यहाँ नहीं कहोगे तो कहाँ कहोगे ? हम है न सुनने वाले | एक वार सच्ची बात बाहर आना ही चाहिए |