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नारणदास करसन भाई शाह वैष्णव राणपुर
जन्म तिथि ३-४-१९०५-१७-९-७१ माता-पिता का नाम करसन भाई शाह माता- जबब बेन शिक्षा परिवार इकलोती संतान थे | पत्नी समता बेन पुत्र -१- नगीन भाई एवं रमेंश भाई ०२७५२-२२३७५६, ९३७४५२८०३३ सुरेन्द्र नगर के पुत्र हीरेन भाई- अमदाबाद ७८७८७९८०३४ | पुत्री – विमला बेन, शांता बेन, धनलक्ष्मी बेन(प्राणलाल भाईकामदार की बेटी मालती जगदीश भाई संघवी -९३७५९७७१४५) एवं लाभु बेन | व्यवसाय गुरुदेवश्री का परिचय स्थानकवासी सम्प्रदाय में जब गुरुदेवश्री थे तब से जुड़ान था | परिवर्तन के बाद गुरुदेव जहाँ -२ जाते वहां -२ भोजन को पहले चख लेते तब गुरुदेव को कराते थे | गुरुदेव को कोई जहर न देवे इसलिए स्वयं सारी परीक्षा करते थे | इनके साथ ३ भाई और थे | ये चारों भाई तन मन धन से सेवा करते थे | अंतिम ३५ वर्ष गुरुदेव के साथ रहे | रचनात्मक कार्य बैशाख वदी ६, ६ मई १९४२ बुधवार सोनगढ़ में समवशरण की प्रतिष्ठा में माता पिता बनने का सोभाग्य मिला | मान स्तम्भ का खात मुहूर्त किया, श्री कुन्दकुन्द प्रवचन मंडप में लगे चित्र पट का काम आपकी देख रेख में हुआ | गुरुदेव श्री की हाजरी में आपका देहावसान सोनगढ़ में ही हुआ | राणपुर का मंदिर बनाया | आज यहाँ के भगवान पोन्नूर में विराजमान हैं | सोनगढ़ समिति में सबसे पहले २०० व्यक्तिओं के आहार-शयन हेतु वर्तन –विस्तर-शतरंजी सेट आपने दिए थे |आपके यहाँ शतरंजी एवं कॉटन का कपड़ा बनाने की फेक्टरी थी | गुरुदेव की रक्षा में राणपुर के चार भाई थे १- प्रेमचंद्र भाई २- वाड़ी लाल भाई ३- नानालाल जसाणी ४- हीराचन्द्रमास्टर | गुरुदेव के बिहार समय डंडा लेकर चारो ओर चलते थे | १९७१ में अहमदाबाद में गुरुदेव को स्वप्न में आये गुरुदेव ने पूछा मरण पछि कैसे आये बोले आपका दर्शन करने आये | देवों के संघ में कहीं के दर्शन करने को निकले थे | प्रेरक प्रसंग भोजन में विष मिलाने का भय था | बिना परीक्षण के भोजन नहीं दिया जाता था | बिहार समय स्व.नारण दास करसन भाई राणपुर भोजन चखते थे तब गुरुदेव श्री को दिया जाता था |