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अमृतलालभाई
जन्म तिथि मोलमीन में जन्मे (१९१४-१९५६) (४२ वर्ष) माता-पिता का नाम शिक्षा मेंट्रिक तक पढे पूरे गुजरात में प्रथम आये थे | परिवार पुत्र – स्व.किशोर भाई – पत्नी मधु बेन बोम्बे |कांदिवली ०२२८०-८३१६०, मो – ९८२१२१८२१० व्यवसाय १५ वर्ष की उम्र में रंगून गये, २५ वर्ष की उम्र में रंगून से बापस आये | प्लेन की आवाज सुनकर घर से बाहर देखने निकले तो भगदड़ देखी सब लोग भाग लिए पीछे मुड़कर देखा स्वयं के घर पर की बम गिरा था | तब २ वर्ष ६ माह पैदल चलकर दिल्ली आये फिर बढबाण आये वहां उधार लेकर काम किया पति पत्नी रूखी ज्वारी की रोटी खाते एव फ्री छाछ मिलती उससे खाते थे | कर्ज उतारने के बाद कुछ धन जोड़कर मुंबई गए वहां ४ वर्ष रहे | सारे भाइयों का व्यापार जमाकर २ वर्ष बाद खेमजी भाई राजकोट का पत्र मिला जैसा गुरु हमें चाहिए था वैसा यहाँ सोनगढ़ में मिल गया आ जाओ | ३२ वर्ष की उम्र में सोनगढ़ आ गये | मात्र वर्ष में १ दिन व्यापार देखने भाइयों के आग्रह से जाते थे | गुरुदेवश्री का परिचय रचनात्मक कार्य सित १९५० से १९५६ तक यहाँ आकर गुरुदेव श्री के प्रवचन खेमजी भाई के साथ मिलकर सद्गुरु प्रवचन प्रसाद नाम से दैनिक पत्र हाथ से साईक्लोस्टाइलसे छापने के लिए स्टेंसिल पर लिखते थे एवं रोटर से घुमाते थे | प्रतिदिन छापकर अगले दिन लोगों को मिलता था | यह पत्र ७ साल तक चला | मात्र ४ घंटे सोते थे | गुरुदेव के प्रति अत्यंत भक्ति थी सभी इनके प्रशंसक थे | बड़े परिश्रमी थे | गुरुदेव की यात्रा का पूरा प्रबंध करते थे | अत्यंत मधुर भाषी थे | पर्युषण में प्रवचन करने जाते थे | १९५१ में खंडवा गये तो धूम मच गई | ब्र. आशा बेन को बोले मेंरे बेटी नहीं हैं तुम सोनगढ़ चलो मेंरी बेटी की तरह रक्षा करूँगा | उन्हीं से प्रभावित होकर खंडवा मंडल बना | प्रेरक प्रसंग कार्तिक वदी ७, स.२०१३,सन १९५६ में सुरेन्द्रनगर में गुजरे | पहली वार सम्मेद शिखर जाने वाले थे | रात को डॉ को सीने का दर्द चेक कराया सोये सुबह ४ बजे उठ गये पत्नी से वांचने को कहा स्वयं सुनते -२ हिचकी आई और ६ बजे देह छुट गई | इसी तिथि पर गुरुदेव इनके घर पर २४ वार आहार लेने आये |